सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

असम में परिसीमन पर सियासत तेज: क्या घटेगा मुस्लिम प्रतिनिधित्व?

रिपोर्ट: युनुस खान (विकास किरण न्यूज)

लोअर असम के बरपेटा ज़िले की मंदिया सीट पर कांग्रेस की रैली में उमड़ी भारी भीड़ इस बात का संकेत देती है कि चुनावी माहौल में स्थानीय मुद्दे ज़ोर पकड़ रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में पहुंचे लोगों में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी अधिक देखी गई।
असम की राजनीति में इस समय कई मुद्दे चर्चा में हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच सबसे ज्यादा चिंता परिसीमन (Delimitation) को लेकर देखी जा रही है। इसके अलावा बेदखली, भेदभाव, पिछड़ापन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे भी लोगों के बीच प्रमुख हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी करीब 35 प्रतिशत है, जो जम्मू-कश्मीर के बाद देश में सबसे अधिक है। 126 सदस्यीय असम विधानसभा में फिलहाल 31 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें कांग्रेस और एआईयूडीएफ़ के विधायक शामिल हैं।

परिसीमन के बाद बदला सियासी गणित

साल 2023 में चुनाव आयोग द्वारा किए गए परिसीमन के बाद कई विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं बदल दी गईं, जिससे राजनीतिक समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या कम कर दी गई है।
कांग्रेस के एक प्रवक्ता के अनुसार, पहले जहां लगभग 32-33 सीटों पर मुस्लिम मतदाता बहुमत में थे, अब यह संख्या घटकर करीब 21-22 रह गई है। उनका कहना है कि इससे भविष्य में मुस्लिम प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

ज़मीनी स्तर पर भी चिंता

मध्य असम के होजाई ज़िले में नई बनी बीनाकांदी सीट को लेकर भी ऐसी ही चर्चाएं हैं। बताया जा रहा है कि इस सीट पर अब 90 प्रतिशत से अधिक मतदाता मुस्लिम हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि परिसीमन के जरिए समुदाय विशेष को एक जगह समेटने की कोशिश की गई है।
बरपेटा ज़िले में भी पहले की मुस्लिम बहुल सीट अब मिश्रित हो चुकी है, जिससे चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। इसी तरह बराक घाटी और अन्य क्षेत्रों में भी कई सीटों की स्थिति बदली है।

सरकार और विपक्ष आमने-सामने
राज्य सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि परिसीमन पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ है और इसमें किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं किया गया।
वहीं विपक्ष का दावा है कि सीटों का पुनर्गठन राजनीतिक फायदे को ध्यान में रखकर किया गया है। कुछ नेताओं का कहना है कि इससे एक खास वर्ग का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन के बाद जनसांख्यिकीय संतुलन बदला है और इसका असर आने वाले चुनावों में साफ दिखाई दे सकता है। उनका कहना है कि इससे कुछ समुदायों की राजनीतिक भागीदारी प्रभावित होने की संभावना है।

निष्कर्ष

असम में परिसीमन अब सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बदले हुए सियासी समीकरण किस पार्टी के पक्ष में जाते हैं और किसके लिए चुनौती बनते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भोपाल में तनाव: पत्थरबाज़ी, बयानबाज़ी और हमारी गंगा-जमुनी तहजीब

विशेष रिपोर्ट • युनुस खान विकास किरण ब्लॉग •  अरिफ नगर में गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान जो विवाद शुरू हुआ, वह बहुत जल्द ही केवल एक घटनाक्रम से आगे बढ़कर शहर के राजनीतिक और सामाजिक माहौल की चर्चा बन गया। शुरुआती मीडिया कवरेज में पत्थरबाज़ी के आरोप उठे — पर अब पुलिस की जांच ने तस्वीर को बदल कर रख दिया है। पुलिस जांच — क्या मिला? स्थानीय पुलिस ने विस्तृत तफ्तीश के बाद निष्कर्ष निकाला है कि पत्थरबाज़ी के जो आरोप लगे थे, वे ठोस तौर पर साबित नहीं हुए। जांच में यह संकेत मिला कि यह मामला किसी सामुदायिक संघर्ष से ज़्यादा आपसी रंजिश और कुछ व्यक्तियों द्वारा झूठे आरोप लगाकर एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने की कोशिश था। पुलिस ने कहा है कि अफवाह फैलाई गई और साजिश के इरादे से गलत आरोप लगाए गए। "जांच में यह स्पष्ट हुआ कि घटना की जो तस्वीर बनाई जा रही थी, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाती।" — पुलिस सूत्र समाजसेवी मोहसिन अली खान की प्रतिक्रिया समाजसेवी मोहस...

शिबू सोरेन का निधन, शिबू सोरेन का इतिहास, Shibu Soren dies, history of Shibu Soren,

झारखंड की आत्मा को श्रद्धांजलि:  झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक, शिबू सोरेन जी के निधन की खबर से पूरे देश में शोक की लहर है। "गुरुजी" के नाम से मशहूर शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज के हक़ और अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका जाना सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। 🌿 प्रारंभिक जीवन और संघर्ष शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के दुमका ज़िले के नेमरा गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता की हत्या जमींदारों द्वारा कर दी गई थी, जिसने उनके अंदर अन्याय के विरुद्ध आग भर दी। ✊ आदिवासी अधिकारों की लड़ाई 1970 के दशक में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और ज़मीन हड़पने वालों, उद्योगपतियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनआंदोलन छेड़ दिया। 🏛️ राजनीतिक जीवन 1980 में पहली बार लोकसभा पहुंचे। 2005, 2008 और 2009 में झारखंड के मुख्यमंत्री बने। यूपीए सरकार में कोयला मंत्री भी रहे। 🕊️ ...

एमपी में एक साथ 177 अधिकारियों को हटाया गया, मची खलबली!

📰 एमपी में एक साथ 177 अधिकारियों को हटाया गया, मची अफरातफरी! भोपाल। मध्यप्रदेश में प्रशासनिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब सरकार ने एक ही झटके में 177 अधिकारियों का तबादला कर डाला। इस अचानक हुई बड़ी प्रशासनिक सर्जरी से न केवल अफसरशाही में हलचल है, बल्कि राजनैतिक गलियारों में भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। 🔁 तबादलों की बुलेट लिस्ट: 70 अपर कलेक्टर 107 राज्य प्रशासनिक सेवा के प्रभारी डिप्टी कलेक्टर व अन्य अधिकारी कुल मिलाकर, प्रदेश के 177 अधिकारियों को उनके वर्तमान पदों से हटाकर नई जिम्मेदारियों में भेजा गया है। 🗂 किसने जारी किए आदेश? यह आदेश सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की ओर से सोमवार देर रात को जारी किया गया। 107 अधिकारियों की सूची उप सचिव ब्रजेश सक्सेना द्वारा जारी की गई है। 70 अधिकारियों की सूची अवर सचिव एस.के. सेंद्रे ने जारी की है। इस लिस्ट में प्रदेश के कई संयुक्त कलेक्टर , अपर कलेक्टर और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं, जिनका कार्यक्षेत्र अ...